हिन्दी और मैं

Tuesday, January 10, 2006

शक्ति और क्षमा

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल,
तभी पूजता जग है,
बल का दर्प चमकता उसके,
पीछे जब जगमग है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को,
जिसके पास गरल हो,
उसका क्या जो दंतहीन,
विषहीन, विनीत, सरल हो।

- रामधारी सिंह दिनकर

कदम्ब का पेड़

यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ, होता यमुना तीरे,
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।
ले देतीं यदि मुझे बाँसुरी तुम दो पैसे वाली,
किसी तरह नीचे हो जाती यह कदम्ब की डाली।

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर, मैं चुपके-चुपके आता,
उस नीची डाली से अम्मा, ऊँचे पर चढ़ जाता।
वहीं बैठ फिर बड़े मज़े से मैं बांसुरी बजाता।
'अम्मा-अम्मा' कह वंशी के स्वर में तुम्हें बुलाता।

सुन मेरी वंशी को माँ, तुम इतनी खुश हो जातीं,
मुझे देखने काम छोड़कर तुम बाहर तक आतीं।
तुमको आया देख बाँसुरी रख मैं चुप हो जाता,
पत्तों में छिपकर धीरे से फिर बाँसुरी बजाता।

तुम हो चकित देखतीं चारों ओर, न मुझको पातीं,
तब व्याकुल-सी हो कदम्ब के नीचे तक आ जातीं।
पत्तों का मर्मर स्वर सुन जब ऊपर आँख उठातीं,
मुझको ऊपर चढ़ा देखकर कितना घबरा जातीं।

गुस्सा होकर मुझे डाटतीं, कहतीं नीचे आजा,
पर जब मैं न उतरता, हँसकर कहतीं - "मुन्ने राजा,
नीचे उतरो मेरे भैया! तुम्हें मिठाई दूँगी।
नये खिलौने माखन मिश्री दूध मलाई दूँगी।"
मैं हँस कर सबसे ऊपर की टहनी पर चढ़ जाता,
एक बार 'माँ' कह पत्तों में वहीं कहीं छिप जाता,
बहुत बुलाने पर भी माँ, जब मैं न उतरकर आता।
तब माँ, माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।

तुम आँचल पसार कर अम्मा, वहीं पेड़ के नीचे।
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे।
तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता।

तुम घबरा कर आँख खोलतीं फिर भी खुश हो जातीं,
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी ही में पातीं।
इसी तरह कुछ खेला करते हम तुम धीरे-धीरे।
माँ कदम्ब का पेड़ अगर यह, होता यमुना तीरे।

- सुभद्रा कुमारी चौहान

Sunday, January 08, 2006

मधुशाला

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला;
पहले भोग लगा लूँ तुझको फिर प्रसाद जग पाएगा;
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।1।।

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
'किस पथ से जाऊँ ?' असमंजस में है वह भोलाभाला;
अलग-अलग पथ बतलाते सब, पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।' ।6।।

सुन, कलकल, छलछल मधु - घट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रुनझुन, रुनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला;
बस आ पहुँचे, दूर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है;
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।10।।

एक बरस में एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाजी, जलती दीपों की माला;
दुनियावालो, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज मनाती मधुशाला।।26।।

लाल सुरा की धार लपट-सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी है;
पीड़ा में आनन्द जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।14।।

धर्म-ग्रंथ सब जला चुकी है जिसके अन्तर की ज्वाला,
मंदिर मस्जिद, गिरजे-सबको तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादरियों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।17।।

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करूँ पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला'
स्वागत के ही साथ बिदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही, मेरी जीवन - मधुशाला।।66।।

- हरिवंशराय बच्चन